हमने क्या पाया, हमने क्या खोया,
ये तो किस्मत की बात है,
ये डर है क्या, ये मजबूरी है क्या,
इस जीवन के जो हालात हैं,
हम तो निकले थे आसमां की आस लिये,
धरती पर आ गिरे तो हैरत की क्या बात है,
कन्धों पर है आशाओं का भार जो,
लबों पर है काल को इनकार जो,
चंचल चपल यौवन का है आधार जो,
इस धरातल से उट्ठे है हर पल पुकार जो,
उस पर फक्र कर ए मुसाफिर,
तेरा जीवन इसके बिन निराधार है,
आगाज़ को अंजाम देना हर इंसान की फितरत नहीं,
एक उज्ज्वल भविष्य का तू शिल्पकार है.
Tuesday, August 30, 2011
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